रविवार, 25 अगस्त 2013


The mind will always create problems. But what is essential is that when we make mistakes, when we are in pain, to meet these mistakes, these pains, without judgment, to look at them without condemnation, to live with them and to let them go by. And that can only happen when the mind is in the state of noncondemnation, without any formula; which means, when the mind is essentially quiet, when the mind is fundamentally still; then only is there the comprehension of the problem..........J. KRISHANAMURTI

रायपुर में ओशो ध्यान शिविर

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छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डॉ रमन सिंह का साक्षात्कार 2 साल पूरे होने पर

रमन उठ, घर चल, छत्तीसगढ़ पढ़ !

प्रकाशन :13-12-2010  (करीब तीन साल पहले लिखा गया ये लेख मुझे आज भी प्रासंगिक लगता है।)
संजय शर्मा
(मुख्यमंत्री के दूसरे कार्यकाल के दो वर्ष पूरे होने पर विशेष)
त्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डॉ रमन सिंह ने अपने दूसरे कार्यकाल के दो वर्ष पूरे कर लिए हैं। इस तरह सात सालों का लंबा कार्यकाल उन्होंने पूरा कर लिया है। इस मौक़े पर मुझे लगता है कि उनके जब तीन साल बाक़ी हैं और तीसरी पारी की तैयारी का समय हो चला है तब डॉ. रमन और उनकी पार्टी को इन सात सालों की तटस्थतापूर्वक समीक्षा करने की ज़रूरत है। और सबसे ज़्यादा तो निंदकों को सुनने की ज़रूरत है।
छत्तीसगढ़ राज्य बना तो हम सब छत्तीसगढिय़ा बेहद उत्साहित थे। उस समय मै जिस अख़बार में काम करता था उसमें छत्तीसगढ़ को लेकर काफ़ी चीज़ें हम लिखते थे। हर तरफ़ उत्साह दिख रहा था। किसी वरिष्ठ नेता की जगह अपेक्षाकृत नए आदमी को मुख्यमंत्री बनाए जाने को लेकर तरह-तरह की बातें होती थीं लेकिन लोग छत्तीसगढ़ी में धारा प्रवाह बोलते मुख्यमंत्री को देखकर सब भूल से गए थे।
अपना राज है इसका अहसास आज भी तब होता है जब लोग मुख्यमंत्री को छत्तीसगढ़ी में बोलते देखते हैं। डॉ रमन पर बात से पहले कुछ पीछे याद कर लिया जाए ऐसा मुझे लगता है इससे आगे की बात थोड़ी आसान हो जाती है।
अगर मै अपनी बात करूं तो मेरा उत्साह बहुत जल्दी ही भंग हो गया था। पत्रकार होने के नाते नई सरकार के कामकाज पर रिपोर्टिंग करनी ही पड़ जाती थी और कुछ ही महीने में राजनीति का वह चेहरा दिखने लगा जिससे मुझे डर लगने लगा था। ये सोचकर बहुत परेशान था मै कि नए राज्य को हम किस दिशा में लेकर जा रहे हैं। अगर शुरूआत ही गलत हुई तो भविष्य कैसा होगा ? हमारा सामाजिक सद्भाव में डूबा छत्तीसगढ़ कौन सी राह पकड़ेगा? राजनीति के अखाड़े में जब मै देखता कि दाहिना हाथ बाएं हाथ पर शक़ कर रहा है और उसे उखाड़ फेंकने को तैयार है तो कोफ्त भी होती थी। राजनीति ने उस समय सामाजिक संघर्ष की नींव डालने का काम शुरू कर दिया था और तभी सरकार बदल गई। जनता जान चुकी थी सत्ता की बागडोर तुरंत सही हाथों में देने की ज़रूरत है।
यहाँ पर डॉ रमन सिंह पर्दे पर आए। लोग इस बार भी संशय में दिख रहे थे कि डॉ रमन सिंह क्या उस कीचड़ को धो पोछ पाएंगे जो हमारे आंगन में पहले के लोग फैला गए थे और मै एक ही दिन बाद आश्वस्त था। आज सात सालों में रमन सिंह ने लंबा रास्ता तय किया है और इस तरह तय किया है कि सामाजिक समरसता को बिगाड़कर राजनीति करने वाले कहाँ गिरे पता ही नहीं चल रहा।
राज बनने के समय यहाँ के ग़रीबों और किसानों की स्थिति में तत्काल कुछ सुधार दिखने की उम्मीद थी लेकिन वह पूरी नहीं हुई थी। डॉ. रमन के आते ही असर दिखने लगा। मध्यप्रदेश के ज़माने में मै सालों तक धान की ख़रीदी में दलालों और कोचियों की भूमिका और किसानों के शोषण पर लगातार स्टोरी करता रहता था। डॉ रमन की सरकार ने पूरा धान खरीदने की घोषणा की । उस दिन सचमुच मुझे बहुत खुशी हुई थी। मै यहाँ आँकड़े लेकर इस सरकार के काम की समीक्षा नहीं कर रहा पर इस यात्रा में जो दो तीन महत्वपूर्ण बातें करनी चाहिए लगता है उसकी चर्चा कर रहा हूँ।  गाँव ग़रीब और किसान का नारा रमन सिंह ने दिया था। एक और विषय पीडीएस का था जिस पर भी मै सालों तक नज़र जमाए हुए था और उसमें मची लूटमार की ख़बरें मै अक्सर देता था। जब चुनाव के पहले गरीबों को 2 और 3रूपए में चावल देने की घोषणा हुई तो चिंता बढ़ी पर पीडीएस के डकैतों को मुख्यमंत्री ने चेतावनी दे देकर हद में रखा हालांकि डकैती अभी पूरी तरह बंद नहीं हो पाई है। कई और काम उन्होंने किए जिससे जनता की राह आसान हुई है पर मै उन्हें गिनाने नहीं जा रहा। इसके लिए सरकार का अपना जनसंपर्क विभाग है। जनता का जीवन स्तर भी इन सालों में सुधरा और दूसरी बार चुनाव हो गए। शुरूआती दौर के अपने शासकों से डर चुकी जनता ने दोबारा रमन सिंह को ही पसंद किया।
पर मुझे लगता है डॉ रमन सिंह को चुनावी तैयारी में जुटने से पहले उपलब्धियाँ नहीं जो कमियाँ रह गईं हैं उन पर ध्यान देना चाहिए और यह ऐसी कमियाँ है जो छत्तीसगढिय़ा को उसकी अस्मिता बचाने नहीं दे रही। छत्तीसगढिय़ा आज ठगा हुआ सा खड़ा नज़र आ रहा है क्योंकि यहाँ उसकी कोई पूछ होती नज़र नहीं आ रही है। यह सही है कि मात्र विकास के पैमाने पर सरकार के काम से जनता संतुष्ट है पर वह छत्तीसगढिय़ा के रूप में जिस छत्तीसगढिय़ा पहचान को कायम करना चाहती है उसमें एक भी प्रभावी कदम बढ़ता नज़र नहीं आता। बल्कि छत्तीसगढिय़ा होना आज शासन के दरवाज़े पर कमी की तरह देखा जा रहा है और यह तब हो रहा है जब मुख्यमंत्री छत्तीसगढिय़ा है। मुख्यमंत्री की पार्टी में भी उनके अपने सहयोगी नेता इसे लेकर आवाज़ उठाते रहे हैं। किसी भी राज्य की पहचान मात्र विकास से की जा सकेगी यह सोचना गलत है। दुनियाँ में ऐसा कोई देश और राज्य नहीं मिलेगा जो अपनी पहचान को महत्व न देता हो पर अंग्रेजी दासता के चलते जिस तरह भारतीयता का दमन हुआ और अंग्रेजी आज भी हावी है उसी तरह छत्तीसगढिय़ा पहचान का भी दमन हो रहा है। पर यह नया राज्य है इस पर अभी से ध्यान दिया गया तो इसे रोका जा सकता है। यहाँ और विस्तार में न जाते हुए एक दो और बातें कहना ज़रूरी समझता हूं।
अपने पहले कार्यकाल में रमन सिंह ने जन हितैषी क़दम तो उठाए पर भ्रष्टाचार और अफ़सरशाही के चंगुल से जनता को छुटकारा दिलाने में असफल रहे। दोबारा सत्ता में आने पर उन्होंने कुछ इस अंदाज़ में बातें की कि लगा अब इस बार वे पूरी ताकत से अफ़सरशाही को कुचल देंगे और एक ज़िम्मेदार और समय पर काम करने वाला प्रशासन देंगे।
पिछले कार्यकाल में जनता ने पहला मौक़ा है समय दो सोचकर टाला पर दूसरा कार्यकाल भी अफ़सोस के साथ कहना पड़ रहा है कि पहले से ज़्यादा बेहतर नहीं है। सरकारी दफ़्तरों में लूट खसोट मची हुई और अमन पसंद मुख्यमंत्री यह देख नहीं पा रहे। जनता का कोई काम समय पर नहीं हो रहा । अफ़सर अपनी पसंद की ही फ़ाइलें देखते हैं और जनता महीनों और सालों तक चक्कर लगा लगाकर थक रही है।  भ्रष्टाचार चरम पर है और खेद की बात है कि इसमें मंत्रालय सबसे आगे है जहाँ मुख्यमंत्री खुद बैठते हैं। सरकार में नियमों के ख़िलाफ़ अधिकारी काम कर रहे हैं पर कोई उनसे जवाब तलब करने वाला नहीं है। प्रमुख सचिव स्तर के भी अधिकारी नीचे से जो लिखकर आ जाए उसे वैसे का वैसा जाने देते हैं जब तक मामला उनकी रूचि का न हो। उनकी रूचि का मामला हो तो नियम की व्याख्या भी मनपसंद ढंग से हो रही है लेकिन आम जनता का मामला है तो ग़लत व्याख्या भी सचिव को नहीं दिख रही है। जिलों से लेकर मंत्रालय तक फ़ाइलें घूम रही हैं और इस सरकार में बैठे लोगों को नहीं पता कि ऐसा क्यों हो रहा है। हैरानी की बात है कि जिन फ़ाइलों को जिले में या संचालनालय स्तर पर ही निपटाया जा सकता है उन्हें भी मंत्रालय भेजा जाता है और मंत्रालय में बैठे लाखों रूपए महीने का बोझ जनता पर डाल रहे आई ए एस अफ़सर यह सवाल नहीं कर रहे कि संचालनालय को जो निपटाना चाहिए वह ऊपर क्यों भेजा जा रहा?
ज़ाहिर है सबको रिश्वत चाहिए और रमन सिंह के कार्यकाल की सारी उपलब्धियाँ यही मंत्रालय में बैठे अफ़सर हजम करने में लगे हैं। यह हम रोज़ मंत्रालय और दूसरे विभागों में घूमते हुए देखते सुनते हैं। प्रदेश के मुख्य सचिव से भी मैने जब कभी इसकी चर्चा की उन्होंने माना कि बिना जवाबदेही के काम हो रहा है पर वे भी कुछ कर पाने में असमर्थ नज़र आ रहे हैं। ऐसे में यह जिम्मेदारी मुख्यमंत्री की ही बनती है। उन्हें मंत्रालय का कॉडर ख़त्म करने के बारे में भी सोचना चाहिए क्योंकि इसी के कारण वहाँ बैठे कर्मचारी अधिकारी ख़ुद को मालिक समझते हैं और छत्तीसगढ़ की जनता को नौकर। अपने दूसरे कार्यकाल के दो वर्ष पूरे होने की पूर्व संध्या पर डॉ रमन सिंह ने कहा है कि अब प्रशासन में जवाबदेही लाने के लिए भी वे काम करेंगे। हमें उनकी बात पर भरोसा करना चाहिए और उम्मीद की जानी चाहिए कि अगले चुनाव के पहले जनता जिस तरह अभी विकास के मामले में अपने राज को महसूस कर रही है उसी तरह प्रशासन भी उसका अपना है इसका अहसास उसे होगा।
सरकार ने एक तरह से आधे राज्य में भय मुक्त शासन तो दे दिया है इसमें शक़ नहीं है लेकिन आदिवासी इलाकों में अभी भी सैकड़ों हज़ारों लोग बेघर जीवन जी रहे हैं। हजारों बच्चों की पढ़ाई चौपट दिख रही है। बंदूकों के साए में जी रहे आदिवासी पिस रहे हैं और इसका कोई ठोस समाधान नहीं निकल पा रहा है। नक्सली समस्या को लेकर रणनीतियाँ बन रही हैं पर बीजेपी में ही कई बड़े नेता मानते हैं कि सरकार को और कड़ा रूख अपनाने की ज़रूरत है।
रूख चाहे जो हो पर अपने हक से वंचित हो रहे लोगों को न्यायपूर्वक जीवन मिल सके इस दिशा में तो सरकार को और कोई रास्ता सोचना ही होगा। नक्सलवाद के समाप्त होने तक इंतज़ार नहीं किया जा सकता है। आदिवासी उपयोजना के नाम पर जो राशि दी जा रही है उसका सही उपयोग हो इस पर भी कड़ाई से नज़र रखी जाए क्योंकि राशि तो ख़ूब भेजी जा रही है पर उसका लाभ सही हकदार को मिल रहा है इसकी देखरेख कमज़ोर है।
डॉ. रमन सिंह को तीसरे कार्यकाल का सपना देखने के पहले यह ठीक से दिख जाए यही कामना है क्योंकि उन्हें दिखाई तो सब दे रहा है पर हम यह मानकर चलें कि ठीक से नहीं दिख पा रहा होगा। और यह भी सही है कि रमन सिंह निश्चिंत हो सकते हैं फ़िलहाल जनता को उनका विकल्प नहीं दिख रहा है। ऐसे में वे कुछ न भी देखें तो भी आज की तारीख़ में तो वे मज़बूत दिख रहे हैं लेकिन समय को कोई नहीं जानता।
डॉक्टर साहब की गाँव गरीब की चिंता के बावजूद अभी शासन उस रसोईए की तरह दिखता है जो शादी घर में खाना बनाने तो जाता है पर घरवालों से लगाव नहीं दिखाता। पैसा लो काम करो चलते बनो। छत्तीसगढिय़ा की पहचान इस प्रदेश में हो और शासन छत्तीसगढिय़ा के ज़्यादा क़रीब आए इसके लिए बहुत तेज़ी से बहुत काम करने की ज़रूरत होगी और इसमें डॉ रमन सिंह को कठोर क़दम भी उठाने होंगे। ऐसा करने पर हो सकता है आजू बाजू के कुछ लोग नाराज़ हो जाएं पर छत्तीसगढिय़ा उन्हें सर पर बिठाने को तैयार होगा। मुझे पहली की किताब की पंक्तियाँ याद आ रही हैं और मै उसे इस तरह याद कर रहा हूँ -  रमन उठ घर चल......छत्तीसगढ़ पढ़.....।

 
BOOK OF MIRDAD - किताब ए मीरदाद में प्रार्थना के संबंध में कही गई बातें सभी सत्य के खोजियों को पढ़नी चाहिए ऐसा लगता है.......
 
 
Photo: अध्याय ………. १३ ………. तेरह 
~~~~~~~~~~ प्रार्थना ~~~~~~~~~
मीरदाद: तुम व्यर्थ में प्रार्थना करते हो जब तुम अपने आप को छोड़ देवताओं को सम्बोधित करते हो। 
 क्योकि तुम्हारे अंदर है आकर्षित करने की शक्ति, जैसे दूर भगाने की की शक्ति तुम्हारे अंदर है। 
 और तुम्हारे अंदर हैं वे वस्तुएँ जिन्हें तुम आकर्षित करना चाहते हो, जैसे वे वस्तुएँ जिन्हें तुम दूर भगाना चाहते हो तुम्हारे अंदर हैं। 
 क्योंकि किसी वस्तु को लेने का सामर्थ्य रखना उसे देने का सामर्थ्य रखना भी है।
 जहां भूख है, वहां भोजन है। जहां भोजन है, वहां भूख भी अवश्य होगी। भूख की पीड़ा से व्यथित होना तृप्त होने का आनंद लेने का सामर्थ्य रखना है। 
 हाँ, आवश्यकता में ही आवश्यकता की पूर्ति है। 
 क्या चाबी ताले के प्रयोग का अधिकार नहीं देती? क्या ताला चाबी के प्रयोग का अधिकार नहीं देती ? क्या ताला और चाबी दोनॉ दरवाजे के प्रयोग का अधिकार नहीं देते ? 
जब भी तुम चाबी गँवा बैठो या उसे कहीं रखकर भूल जाओ, तो लोहार से आग्रह करने के लिये उतावले मत होओं। लोहार ने अपना काम कर दिया है, और अच्छी तरह से कर दिया है; उसे वही काम बार-बार करने के लिये मत कहो। तुम अपना काम करो और लोहार को अकेला छोड़ दो; क्योंकि जब एक बार वह तुमसे निपट चूका है, उसे और भी काम करने हैं। अपनी स्मृति में से दुर्गन्ध और कचरा निकाल फेंको, और चाबी तुम्हे निश्चय ही मिल जायेगी|
अकथ प्रभु ने उच्चारण द्वारा जब तुम्हे रचा तो तुम्हारे रूप में उसने अपनी ही रचना की। इस प्रकार तुम भी अकथ हो। 
 प्रभु ने तुम्हे अपना कोई अंश प्रदान नहीं किया--क्योंकि वह अंशों में नहीं बाँट सकता; उसने तो अपना समग्र, अविभाज्य, अकथ ईश्वरत्व ही तुम सबको प्रदान कर दिया। इससे बड़ी किस विरासत की कामना कर सकते हो तुम ? और तुम्हारी अपनी कायरता का अन्धेपन के सिवाय और कौन, या क्या, तुम्हे पाने से रोक सकता हैं ?
फिर भी, कुछ--अन्धे कृतध्न लोग--अपनी विरासत के लिये कृतज्ञं होने के बजाय, उसे प्राप्त करने की राह खोजने के बजाय, प्रभु एक प्रकार का कूडाघर बना देते हैं जिसने वे अपने दांत और पेट के दर्द, व्यापार में अपने घाटे, अपने झगडे, अपनी बदले की भावनाएं तथा अपनी निद्राहीन रातें ले जाकर फेंक सकें। 
 कुछ अन्य लोग प्रभु को अपना निजी कोष बना लेना चाहते हैं जहां से वे जब चाहें संसार की चमकदार निकम्मी वस्तुओं में से हर ऐसी वस्तु को पाने की आशा रखते हैं जिसके लिए वे तरस रहे हैं। 
 कुछ अन्य लोग प्रभु को एक प्रकार का निजी मुनीम बना लेना चाहते हैं, जोकेवल यह हिसाब ही न रखे कि वे किन चीजों के लिये दूसरों के कर्जदार हैं और किन चीजों के लिये उनके कर्जदार है, बल्कि उनके दिये कर्ज को वसूल भी करे और उनके उनके खाते में हमेशा एक बड़ी रकम जमा दिखाये। 
 हाँ, अनेक तथा नाना प्रकार के हैं वे काम जो मनुष्य प्रभु को सौंप देता है। फिर भी बहुत थोड़े लोग ऐसे होंगे जो सोचते हों कि यदि सचमुच इतने सारे काम करने की जिम्मेदारी प्रभु पर है तो वह अकेला ही उनको निपटा लेगा, और उसे यह आवश्यकता नहीं होगी कि कोई उसे प्रेरित करता रहे या अपने कामों की याद दिलाता रहे।
 क्या प्रभु को तुम उन घड़ियों की याद दिलाते हो जब सूर्य उदय होना है और जब चन्द्र को अस्त ?
क्या उसे तुम दूर के खेत में पड़े अनाज के उस दाने की याद दिलाते हो जिसमे जीवन फूट रहा है ? 
क्या उसे तुम उस मकडी की याद दिलाते हो जो रेशे से अपना कौशल-पूर्ण विश्राम-गृह बना रही है ? 
क्या उसे तुम घोंसले में पड़े गौरेया के छोटे-छोटे बच्चों की याद दिलाते हो ?
क्या तुम उसे उन अनगिनत वस्तुओं की याद दिलाते हो जिनसे यह असीम ब्रह्माण्ड भरा हुआ है ? 
तुम अपने तुच्छ व्यक्तित्व को अपनी समस्त अर्थहीन आवश्यकताओं सहित बार-बार उसकी स्मृति पर क्यों लादते हो ? क्या तुम उसकी दृष्टि में गौरेया, अनाज और मकड़ी की तुलना में कम कृपा के पात्र हो ? तुम उनकी तरह अपने उपहार स्वीकार क्यों नहीं करते और बिना शोर मचाये, बिना बिना घुटने टेके,बिना हाथ फैलाये और बिना चिंता-पूर्वक भविष्य में झाँके अपना-अपना काम क्यों नहीं करते ?
और प्रभु दूर कहाँ है कि उसके कानों तक अपनी सनकों और मिथ्याभिमानों को, अपनी स्तुतियों और अपनी फरियादों को पहुँचाने के लिये तुम्हे चिल्लाना पड़े ? क्या वह तुम्हारे अंदर और तुम्हारे चारों ओर नहीं है ? जितनी तुम्हारी जिव्हा तुम्हारे तालू के निकट है, क्या उसका कान तुम्हारे मुँह के उससे कहीं अधिक निकट नहीं है ?
प्रभु के लिये तो उसका ईश्वरत्व ही काफी है जिसका बीज उसने तुम्हारे अंदर रख दिया है। 
 यदि अपने ईश्वरत्व का बीज तुम्हे देकर तुम्हारे बजाय प्रभु को ही उसका ध्यान रखना होता तो तुममे क्या खूबी होती ? और जीवन में तुम्हारे करने के लिये क्या होता ? और यदि तुम्हारे करने को कुछ भी नहीं है, बल्कि प्रभु को ही तुम्हारी खातिर सब करना है, तो तुम्हारे जीवन का क्या महत्व है ? तुम्हारी सारी प्रार्थना से क्या लाभ है ?
अपनी अनगिनत चिंताएँ और आशाएँ प्रभु के पास मत ले जाओ। जिन दरवाजों की चाबियाँ उसने तुम्हे सौंप दी है, उन्हें तुम्हारी खातिर खोलने के लिये मिन्नतें मत करो। बल्कि अपने ह्रदय की विशालता में खोजो। क्योंकि ह्रदय की विशालता में मिलती है हर दरवाजे की चाबी। और ह्रदय की विशालता में मौजूद हैं वे सब चीजें जिनकी तुम्हे भूख और प्यास है, चाहे उनका सम्बन्ध बुराई से है या भलाई से। 
 तुम्हारे छोटे से छोटे आदेश का पालन करने को तैयार एक विशाल सेना तुम्हारे इशारे पर काम करने के लिये तैनात कर दी गयी है। यदि वह अच्छी तरह से सज्जित हो, उसे कुशलतापूर्वक शिक्षण दिया गया हो और निडरता पूर्वक उसका संचालन किया गया हो, तो उसके लिये कुछ भी करना असम्भव नहीं, और कोई भी बाधा उसे अपनी मंजिल पर पहुँचने से रोक नहीं सकती। और यदि वह पूरी तरह सज्जित न हो, उसे उचित शिक्षण न दिया गया हो और उसका सञ्चालन साहसहीन हो, तो वह दिशाहीन भटकती रहती है, या छोटी से छोटी बाधा के सामने मोरचा छोड़ देती है, और उसके पीछे-पीछे चली आती है शर्मनाक पराजय। 
 वह सेना और कोई नहीं, सधुओ, इस समय तुम्हारी रगों में चुपचाप चक्कर लगा रही सूक्ष्म लाल कणिकाएँ हैं; उनमे से हरएक शक्ति का चमत्कार, हरएक तुम्हारे समूचे जीवन का और समस्त जीवन का--उनकी अन्तरतम सूक्ष्मताओं सहित--पूरा और सच्चा विवरण। 
 ह्रदय में एकत्रित होती है यह सेना; ह्रदय में से ही बाहर निकलकर यह मोरचा लगाती है। इसी कारण ह्रदय को इतनी ख्याति और इतना सम्मान प्राप्त है। तुम्हारे सुख और दुःख के आँसू इसी में से फूटकर बाहर निकलते हैं। तुम्हारे जीवन और मृत्यु के भय दौड़कर इसी के अन्दर घुसते हैं। 
 तुम्हारी लालसाएँ और कामनाएँ इस सेना के उपकरण हैं तुम्हारी बुद्धि इसे अनुशासन में रखती है। तुम्हारा संकल्प इससे कवायद करवाता है और इसकी बागडोर संभालता है ।
जब तुम अपने रक्त को एक प्रमुख कामना से सज्जित कर लो जो सब कामनाओं को चुप कर देती है और उन पर छा जाती है; और अनुशासन एक प्रमुख विचार को सौंप दो, तब तुम विश्वास कर सकते हो कि तुम्हारी वह कामना पूरी होगी। 
 कोई संत भला संत कैसे हो सकता है जब तक वह अपने मन की वृति को संत-पद के अयोग्य हर कामना से तथा हर विचार से मुक्त न कर दे, और फिर एक अडिग संकल्प के द्वारा उसे अन्य सभी लक्ष्यों को छोड़ केवल संत-पद की प्राप्ति के लिये यत्नशील रहने का निर्देश न दे? 
मैं कहता हूँ कि आदम के समय से लेकर आज तक की हर पवित्र कामना, हर पवित्र विचार, हर पवित्र संकल्प उस मनुष्य की सहायता के लिये चला आयेगा जिसने संत-पद प्राप्त करने का ऐसा दृढ़ निश्चय कर लिया हो। क्योंकि सदा ऐसा होता आया है कि पानी, चाहे वह कहीं भी हो, समुद्र की खोज करता है जैसे प्रकाश की किरने सूर्य को खोजती हैं। 
 कोई हत्यारा अपनी योजनाएँ कैसे पूरी करता है? वह कवल अपने रक्त को उत्तेजित उसमे ह्त्या के लिये एक उन्माद-भरी प्यास पैदा करता है, उसके कण-कण को हत्यापूर्ण विचारों के कोड़ों की मार से एकत्र करता है, और फिर निष्ठुर संकल्प से उसे घातक बार करने का आदेश देता है। 
 मैं तुमसे कहता हूँ कि केन* से लेकर आज तक का हर हत्यारा बिना बुलाये उस मनुष्य की भुज को सबल और स्थिर बनाने के लिये दौड़ा आयेगा जिस पर ह्त्या का ऐसा नशा सवार हो। क्योंकि सदा ऐसा होता आया है कि कौए, कौओं का साथ देते हैं और लकड़ बग्घे लकड़-बग्घों का। 
 इसलिये प्रार्थना करना अपने अंदर एक ही प्रमुख कामना का, एक ही प्रमुख विचार का, एक ही प्रमुख संकल्प का संचार करना है। यह अपने आप को इस तरह सुर में कि जिस वस्तु के लिये भी तुम प्रार्थना करो, उसके साथ पूरी तरह एक-सुर, एक-ताल हो जाओ। 
इस ग्रह का वातावरण, जो अपने सम्पूर्ण रूप में तुम्हारे ह्रदय में प्रतिबिम्बित है, उन सब बातों की आवारा स्मृतियों से तरंगित है जिन्हें उसने अपने जन्म से देखा है। 
 कोई वचन या कर्म; कोई इक्षा या निःश्वास; कोई क्षणिक विचार या अस्थाई सपना; मनुष्य या पशु का कोई श्वास; कोई परछाईं; कोई भ्रम ऐसा नहीं जो आज के दिन तक अपने-अपने रहस्यमय रास्ते पर न चलता रहा हो, और समय के अंत तक इसी प्रकार उस पर चलते न रहना हो। उनमे से किसी एक के साथ भी तुम अपने ह्रदय का सुर मिला लो, और वह निश्चय ही उसके तारों पर धुन बजाने के लिय तेजी से दौड़ा आयेगा। 
 प्रार्थना करने के लिए तुम्हे किसी होंठ या जिव्हा की आवश्यकता नहीं। बल्कि आवश्यकता है एक मौन, सचेत ह्रदय की, एक प्रमुख कामना की, एक प्रमुख विचार की, और सबसे बढ़कर, एक प्रमुख संकल्प की जो न संदेह करता है न संकोच। क्योंकि शब्द व्यर्थ हैं यदि प्रत्येक अक्षर में ह्रदय अपनी पूर्ण जागरूकता के साथ उपस्थित न हो। और जब ह्रदय उपस्थित और सजग है, तो जिव्हा के लिये यह बेहतर होगा कि वह सो जाये, या मुहरबन्द होंठों के पीछे छिप जाये। 
 न ही प्रार्थना करने के लिये तुम्हें मन्दिरों की आवश्यकता है। 
 जो कोई अपने ह्रदय में मन्दिर को नहीं पा सकता, वह किसी भी मन्दिर में अपने ह्रदय को नहीं पा सकता। 
 फिर भी मैं तुमसे यह सब कहता हूँ, और जो तुम जैसे हैं उनसे भी, किन्तु प्रत्येक मनुष्य से नहीं, क्योंकि अधिकाँश लोग अभी भ्रम में हैं। वे प्रार्थना की जरुरत तो महसूस करते हैं, लेकिन प्रार्थना करने का ढंग नहीं जानते। वे शब्दों के बिना प्रार्थना कर नहीं सकते, और शब्द उन्हें मिलते नहीं जब तक शब्द उनके मुँह में न डाल दिये जायें। और जब उन्हें अपने ह्रदय की विशालता में विचरण करना पड़ता है तो वे खो जाते हैं, और भयभीत हो जाते हैं; परन्तु मंदिरों की दीवारों के अंदर और अपने जैसे प्राणियों के झुंडों के बीच उन्हें सांत्वना और सुख मिलता है। 
कर लेने दो उन्हें अपने मंदिरों का निर्माण। कर लेने दो उन्हें अपनी प्रार्थनाएँ। 
 किन्तु तुम्हें तथा प्रत्येक मनुष्य को दिव्य ज्ञान के लिये प्रार्थना करने का आदेश देता हूँ। उसके सिवाय अन्य किसी वस्तु की चाह रखने का अर्थ है कभी तृप्त न होना। 
 याद रखो, जीवन की कुंजी '' सिरजनहार शब्द'' है। ' सिरजनहार शब्द' की कुंजी प्रेम है। प्रेम की कुंजी दिव्य ज्ञान है। अपने ह्रदय को इनसे भर लो, और बचा लो अपनी जिव्हा को अनेक शब्दों की पीड़ा से, और रक्षा कर लो अपनी बुद्धि का अनेक प्रार्थनाओं के बोझ से, और मुक्त कर लो अपने ह्रदय को सब देवताओं की दासता से जो तुम्हे उपहार देकर अपना दास बना लेना चाहते हैं; जो तुम्हें एक हाथ से केवल इसलिए सहलाते हैं कि दूसरे हाथ से तुम पर बार का सकें; जो तुम्हारे द्वारा प्रशंसा किये जाने पर संतुष्ट और कृपालु होते हैं, किन्तु तुम्हारे द्वारा कोसे जाने पर क्रोध और बदले की भावना से भर जाते हैं; जो तब तक तुम्हारी बात नहीं सुनते जब तक तुम उन्हें पुकारते नहीं; और तब तक तुम्हे देकर बहुधा देने पर पछताते हैं; जिनके लिये तुम्हारे आँसू अगरबत्ती हैं, जिनकी शान तुम्हारी दयनीयता में है। 
 हाँ,अपने ह्रदय को इन सब देवताओं से मुक्त कर लो, ताकि तुम्हें उसमे वह एकमात्र प्रभु मिल सके जो तुम्हें अपने आप से भर देता है चाहता है की तुम सदैव भरे रहो।
 बैनून: कभी तुम मनुष्य को सर्वशक्तिमान कहते हो तो कभी उसे लावारिस कहकर तुच्छ बताते हो। लगता है तुम हमें धुन्ध में लाकर छोड़ रहे हो। 
 क्रमशः........
अध्याय ………. १३ ………. तेरह
~~~~~~~~~~ प्रार्थना ~~~~~~~~~
मीरदाद: तुम व्यर्थ में प्रार्थना करते हो जब तुम अपने आप को छोड़ देवताओं को सम्बोधित करते हो।
क्योकि तुम्हारे अंदर है आकर्षित करने की शक्ति, जैसे दूर भगाने की की शक्ति तुम्हारे अंदर है।
और तुम्हारे अंदर हैं वे वस्तुएँ जिन्हें तुम आकर्षित करना चाहते हो, जैसे वे वस्तुएँ जिन्हें तुम दूर भगाना चाहते हो तुम्हारे अंदर हैं।
क्योंकि किसी वस्तु को लेने का सामर्थ्य रखना उसे देने का सामर्थ्य रखना भी है।
जहां भूख है, वहां भोजन है। जहां भोजन है, वहां भूख भी अवश्य होगी। भूख की पीड़ा से व्यथित होना तृप्त होने का आनंद लेने का सामर्थ्य रखना है।
हाँ, आवश्यकता में ही आवश्यकता की पूर्ति है।
क्या चाबी ताले के प्रयोग का अधिकार नहीं देती? क्या ताला चाबी के प्रयोग का अधिकार नहीं देती ? क्या ताला और चाबी दोनॉ दरवाजे के प्रयोग का अधिकार नहीं देते ?
जब भी तुम चाबी गँवा बैठो या उसे कहीं रखकर भूल जाओ, तो लोहार से आग्रह करने के लिये उतावले मत होओं। लोहार ने अपना काम कर दिया है, और अच्छी तरह से कर दिया है; उसे वही काम बार-बार करने के लिये मत कहो। तुम अपना काम करो और लोहार को अकेला छोड़ दो; क्योंकि जब एक बार वह तुमसे निपट चूका है, उसे और भी काम करने हैं। अपनी स्मृति में से दुर्गन्ध और कचरा निकाल फेंको, और चाबी तुम्हे निश्चय ही मिल जायेगी|
अकथ प्रभु ने उच्चारण द्वारा जब तुम्हे रचा तो तुम्हारे रूप में उसने अपनी ही रचना की। इस प्रकार तुम भी अकथ हो।
प्रभु ने तुम्हे अपना कोई अंश प्रदान नहीं किया--क्योंकि वह अंशों में नहीं बाँट सकता; उसने तो अपना समग्र, अविभाज्य, अकथ ईश्वरत्व ही तुम सबको प्रदान कर दिया। इससे बड़ी किस विरासत की कामना कर सकते हो तुम ? और तुम्हारी अपनी कायरता का अन्धेपन के सिवाय और कौन, या क्या, तुम्हे पाने से रोक सकता हैं ?
फिर भी, कुछ--अन्धे कृतध्न लोग--अपनी विरासत के लिये कृतज्ञं होने के बजाय, उसे प्राप्त करने की राह खोजने के बजाय, प्रभु एक प्रकार का कूडाघर बना देते हैं जिसने वे अपने दांत और पेट के दर्द, व्यापार में अपने घाटे, अपने झगडे, अपनी बदले की भावनाएं तथा अपनी निद्राहीन रातें ले जाकर फेंक सकें।
कुछ अन्य लोग प्रभु को अपना निजी कोष बना लेना चाहते हैं जहां से वे जब चाहें संसार की चमकदार निकम्मी वस्तुओं में से हर ऐसी वस्तु को पाने की आशा रखते हैं जिसके लिए वे तरस रहे हैं।
कुछ अन्य लोग प्रभु को एक प्रकार का निजी मुनीम बना लेना चाहते हैं, जोकेवल यह हिसाब ही न रखे कि वे किन चीजों के लिये दूसरों के कर्जदार हैं और किन चीजों के लिये उनके कर्जदार है, बल्कि उनके दिये कर्ज को वसूल भी करे और उनके उनके खाते में हमेशा एक बड़ी रकम जमा दिखाये।
हाँ, अनेक तथा नाना प्रकार के हैं वे काम जो मनुष्य प्रभु को सौंप देता है। फिर भी बहुत थोड़े लोग ऐसे होंगे जो सोचते हों कि यदि सचमुच इतने सारे काम करने की जिम्मेदारी प्रभु पर है तो वह अकेला ही उनको निपटा लेगा, और उसे यह आवश्यकता नहीं होगी कि कोई उसे प्रेरित करता रहे या अपने कामों की याद दिलाता रहे।
क्या प्रभु को तुम उन घड़ियों की याद दिलाते हो जब सूर्य उदय होना है और जब चन्द्र को अस्त ?
क्या उसे तुम दूर के खेत में पड़े अनाज के उस दाने की याद दिलाते हो जिसमे जीवन फूट रहा है ?
क्या उसे तुम उस मकडी की याद दिलाते हो जो रेशे से अपना कौशल-पूर्ण विश्राम-गृह बना रही है ?
क्या उसे तुम घोंसले में पड़े गौरेया के छोटे-छोटे बच्चों की याद दिलाते हो ?
क्या तुम उसे उन अनगिनत वस्तुओं की याद दिलाते हो जिनसे यह असीम ब्रह्माण्ड भरा हुआ है ?
तुम अपने तुच्छ व्यक्तित्व को अपनी समस्त अर्थहीन आवश्यकताओं सहित बार-बार उसकी स्मृति पर क्यों लादते हो ? क्या तुम उसकी दृष्टि में गौरेया, अनाज और मकड़ी की तुलना में कम कृपा के पात्र हो ? तुम उनकी तरह अपने उपहार स्वीकार क्यों नहीं करते और बिना शोर मचाये, बिना बिना घुटने टेके,बिना हाथ फैलाये और बिना चिंता-पूर्वक भविष्य में झाँके अपना-अपना काम क्यों नहीं करते ?
और प्रभु दूर कहाँ है कि उसके कानों तक अपनी सनकों और मिथ्याभिमानों को, अपनी स्तुतियों और अपनी फरियादों को पहुँचाने के लिये तुम्हे चिल्लाना पड़े ? क्या वह तुम्हारे अंदर और तुम्हारे चारों ओर नहीं है ? जितनी तुम्हारी जिव्हा तुम्हारे तालू के निकट है, क्या उसका कान तुम्हारे मुँह के उससे कहीं अधिक निकट नहीं है ?
प्रभु के लिये तो उसका ईश्वरत्व ही काफी है जिसका बीज उसने तुम्हारे अंदर रख दिया है।
यदि अपने ईश्वरत्व का बीज तुम्हे देकर तुम्हारे बजाय प्रभु को ही उसका ध्यान रखना होता तो तुममे क्या खूबी होती ? और जीवन में तुम्हारे करने के लिये क्या होता ? और यदि तुम्हारे करने को कुछ भी नहीं है, बल्कि प्रभु को ही तुम्हारी खातिर सब करना है, तो तुम्हारे जीवन का क्या महत्व है ? तुम्हारी सारी प्रार्थना से क्या लाभ है ?
अपनी अनगिनत चिंताएँ और आशाएँ प्रभु के पास मत ले जाओ। जिन दरवाजों की चाबियाँ उसने तुम्हे सौंप दी है, उन्हें तुम्हारी खातिर खोलने के लिये मिन्नतें मत करो। बल्कि अपने ह्रदय की विशालता में खोजो। क्योंकि ह्रदय की विशालता में मिलती है हर दरवाजे की चाबी। और ह्रदय की विशालता में मौजूद हैं वे सब चीजें जिनकी तुम्हे भूख और प्यास है, चाहे उनका सम्बन्ध बुराई से है या भलाई से।
तुम्हारे छोटे से छोटे आदेश का पालन करने को तैयार एक विशाल सेना तुम्हारे इशारे पर काम करने के लिये तैनात कर दी गयी है। यदि वह अच्छी तरह से सज्जित हो, उसे कुशलतापूर्वक शिक्षण दिया गया हो और निडरता पूर्वक उसका संचालन किया गया हो, तो उसके लिये कुछ भी करना असम्भव नहीं, और कोई भी बाधा उसे अपनी मंजिल पर पहुँचने से रोक नहीं सकती। और यदि वह पूरी तरह सज्जित न हो, उसे उचित शिक्षण न दिया गया हो और उसका सञ्चालन साहसहीन हो, तो वह दिशाहीन भटकती रहती है, या छोटी से छोटी बाधा के सामने मोरचा छोड़ देती है, और उसके पीछे-पीछे चली आती है शर्मनाक पराजय।
वह सेना और कोई नहीं, सधुओ, इस समय तुम्हारी रगों में चुपचाप चक्कर लगा रही सूक्ष्म लाल कणिकाएँ हैं; उनमे से हरएक शक्ति का चमत्कार, हरएक तुम्हारे समूचे जीवन का और समस्त जीवन का--उनकी अन्तरतम सूक्ष्मताओं सहित--पूरा और सच्चा विवरण।
ह्रदय में एकत्रित होती है यह सेना; ह्रदय में से ही बाहर निकलकर यह मोरचा लगाती है। इसी कारण ह्रदय को इतनी ख्याति और इतना सम्मान प्राप्त है। तुम्हारे सुख और दुःख के आँसू इसी में से फूटकर बाहर निकलते हैं। तुम्हारे जीवन और मृत्यु के भय दौड़कर इसी के अन्दर घुसते हैं।
तुम्हारी लालसाएँ और कामनाएँ इस सेना के उपकरण हैं तुम्हारी बुद्धि इसे अनुशासन में रखती है। तुम्हारा संकल्प इससे कवायद करवाता है और इसकी बागडोर संभालता है ।
जब तुम अपने रक्त को एक प्रमुख कामना से सज्जित कर लो जो सब कामनाओं को चुप कर देती है और उन पर छा जाती है; और अनुशासन एक प्रमुख विचार को सौंप दो, तब तुम विश्वास कर सकते हो कि तुम्हारी वह कामना पूरी होगी।
कोई संत भला संत कैसे हो सकता है जब तक वह अपने मन की वृति को संत-पद के अयोग्य हर कामना से तथा हर विचार से मुक्त न कर दे, और फिर एक अडिग संकल्प के द्वारा उसे अन्य सभी लक्ष्यों को छोड़ केवल संत-पद की प्राप्ति के लिये यत्नशील रहने का निर्देश न दे?
मैं कहता हूँ कि आदम के समय से लेकर आज तक की हर पवित्र कामना, हर पवित्र विचार, हर पवित्र संकल्प उस मनुष्य की सहायता के लिये चला आयेगा जिसने संत-पद प्राप्त करने का ऐसा दृढ़ निश्चय कर लिया हो। क्योंकि सदा ऐसा होता आया है कि पानी, चाहे वह कहीं भी हो, समुद्र की खोज करता है जैसे प्रकाश की किरने सूर्य को खोजती हैं।
कोई हत्यारा अपनी योजनाएँ कैसे पूरी करता है? वह कवल अपने रक्त को उत्तेजित उसमे ह्त्या के लिये एक उन्माद-भरी प्यास पैदा करता है, उसके कण-कण को हत्यापूर्ण विचारों के कोड़ों की मार से एकत्र करता है, और फिर निष्ठुर संकल्प से उसे घातक बार करने का आदेश देता है।
मैं तुमसे कहता हूँ कि केन* से लेकर आज तक का हर हत्यारा बिना बुलाये उस मनुष्य की भुज को सबल और स्थिर बनाने के लिये दौड़ा आयेगा जिस पर ह्त्या का ऐसा नशा सवार हो। क्योंकि सदा ऐसा होता आया है कि कौए, कौओं का साथ देते हैं और लकड़ बग्घे लकड़-बग्घों का।
इसलिये प्रार्थना करना अपने अंदर एक ही प्रमुख कामना का, एक ही प्रमुख विचार का, एक ही प्रमुख संकल्प का संचार करना है। यह अपने आप को इस तरह सुर में कि जिस वस्तु के लिये भी तुम प्रार्थना करो, उसके साथ पूरी तरह एक-सुर, एक-ताल हो जाओ।
इस ग्रह का वातावरण, जो अपने सम्पूर्ण रूप में तुम्हारे ह्रदय में प्रतिबिम्बित है, उन सब बातों की आवारा स्मृतियों से तरंगित है जिन्हें उसने अपने जन्म से देखा है।
कोई वचन या कर्म; कोई इक्षा या निःश्वास; कोई क्षणिक विचार या अस्थाई सपना; मनुष्य या पशु का कोई श्वास; कोई परछाईं; कोई भ्रम ऐसा नहीं जो आज के दिन तक अपने-अपने रहस्यमय रास्ते पर न चलता रहा हो, और समय के अंत तक इसी प्रकार उस पर चलते न रहना हो। उनमे से किसी एक के साथ भी तुम अपने ह्रदय का सुर मिला लो, और वह निश्चय ही उसके तारों पर धुन बजाने के लिय तेजी से दौड़ा आयेगा।
प्रार्थना करने के लिए तुम्हे किसी होंठ या जिव्हा की आवश्यकता नहीं। बल्कि आवश्यकता है एक मौन, सचेत ह्रदय की, एक प्रमुख कामना की, एक प्रमुख विचार की, और सबसे बढ़कर, एक प्रमुख संकल्प की जो न संदेह करता है न संकोच। क्योंकि शब्द व्यर्थ हैं यदि प्रत्येक अक्षर में ह्रदय अपनी पूर्ण जागरूकता के साथ उपस्थित न हो। और जब ह्रदय उपस्थित और सजग है, तो जिव्हा के लिये यह बेहतर होगा कि वह सो जाये, या मुहरबन्द होंठों के पीछे छिप जाये।
न ही प्रार्थना करने के लिये तुम्हें मन्दिरों की आवश्यकता है।
जो कोई अपने ह्रदय में मन्दिर को नहीं पा सकता, वह किसी भी मन्दिर में अपने ह्रदय को नहीं पा सकता।
फिर भी मैं तुमसे यह सब कहता हूँ, और जो तुम जैसे हैं उनसे भी, किन्तु प्रत्येक मनुष्य से नहीं, क्योंकि अधिकाँश लोग अभी भ्रम में हैं। वे प्रार्थना की जरुरत तो महसूस करते हैं, लेकिन प्रार्थना करने का ढंग नहीं जानते। वे शब्दों के बिना प्रार्थना कर नहीं सकते, और शब्द उन्हें मिलते नहीं जब तक शब्द उनके मुँह में न डाल दिये जायें। और जब उन्हें अपने ह्रदय की विशालता में विचरण करना पड़ता है तो वे खो जाते हैं, और भयभीत हो जाते हैं; परन्तु मंदिरों की दीवारों के अंदर और अपने जैसे प्राणियों के झुंडों के बीच उन्हें सांत्वना और सुख मिलता है।
कर लेने दो उन्हें अपने मंदिरों का निर्माण। कर लेने दो उन्हें अपनी प्रार्थनाएँ।
किन्तु तुम्हें तथा प्रत्येक मनुष्य को दिव्य ज्ञान के लिये प्रार्थना करने का आदेश देता हूँ। उसके सिवाय अन्य किसी वस्तु की चाह रखने का अर्थ है कभी तृप्त न होना।
याद रखो, जीवन की कुंजी '' सिरजनहार शब्द'' है। ' सिरजनहार शब्द' की कुंजी प्रेम है। प्रेम की कुंजी दिव्य ज्ञान है। अपने ह्रदय को इनसे भर लो, और बचा लो अपनी जिव्हा को अनेक शब्दों की पीड़ा से, और रक्षा कर लो अपनी बुद्धि का अनेक प्रार्थनाओं के बोझ से, और मुक्त कर लो अपने ह्रदय को सब देवताओं की दासता से जो तुम्हे उपहार देकर अपना दास बना लेना चाहते हैं; जो तुम्हें एक हाथ से केवल इसलिए सहलाते हैं कि दूसरे हाथ से तुम पर बार का सकें; जो तुम्हारे द्वारा प्रशंसा किये जाने पर संतुष्ट और कृपालु होते हैं, किन्तु तुम्हारे द्वारा कोसे जाने पर क्रोध और बदले की भावना से भर जाते हैं; जो तब तक तुम्हारी बात नहीं सुनते जब तक तुम उन्हें पुकारते नहीं; और तब तक तुम्हे देकर बहुधा देने पर पछताते हैं; जिनके लिये तुम्हारे आँसू अगरबत्ती हैं, जिनकी शान तुम्हारी दयनीयता में है।
हाँ,अपने ह्रदय को इन सब देवताओं से मुक्त कर लो, ताकि तुम्हें उसमे वह एकमात्र प्रभु मिल सके जो तुम्हें अपने आप से भर देता है चाहता है की तुम सदैव भरे रहो।
बैनून: कभी तुम मनुष्य को सर्वशक्तिमान कहते हो तो कभी उसे लावारिस कहकर तुच्छ बताते हो। लगता है तुम हमें धुन्ध में लाकर छोड़ रहे हो। 

THE WAY TO PAINLESS LIFE


This is the way to freedom from care and pain:
So think as if your every thought were to be etched in fire upon the sky for all and everything to
see, for so, in truth, it is .

So speak as if the world entire were but a single ear intent on hearing what you say. And so, in
truth , it is .
So do as if your every deed were to recoil upon your heads. And so, in truth, it does.
So wish as if you were the wish. And so, in truth, you are.
So live as if your god Himself had need of you His life to live. And so, in truth, He does.
THE BOOK OF MIRDAD

ध्यानी का आहार--

August 1, 2011 at 12:32am
ध्यानी का आहार-- एक ध्यानी के लिए यह बहुत आवश्यक है कि वह अपने भोजन के प्रति जागरूक रहे, कि वह क्या खा रहा है, कितना खा रहा है, और इसका शरीर पर क्या प्रभाव पड़ेगा। अगर कोई व्यक्ति जागरूकता से कुछ महीने प्रयोग करे, तो वह निश्चित रूप से पता लगा लेगा कि कौन सा भोजन उसे स्थिरता, शांति और स्वास्थ्य प्रदान करता है। इसमें कोई मुश्किल नहीं है, परन्तु यदि हम अपने भोजन के प्रति जागरूक नहीं हैं, तो हम कभी अपने लिए सही भोजन नहीं तलाश पाएंगे| ओशो
THE BOOK OF MIRDAD (किताब ए मीरदाद) का एक अंश.........सचमुच ऐसा ही है जैसे कृष्ण ने अर्जुन को विराट का परिचय कराते समय कहा हो.......
अध्याय २१ इक्कीस
पवित्र प्रभु-इच्छा
घटनाएं जैसे और जब घटती हैं
वैसे और तब क्यों घटती हैं
मीरदाद: कैसी विचित्र बात है कि तुम, जो समय और स्थान के बालक हो, अभी तक यह नहीं जानते कि समय स्थान की शिलाओं पर अंकित की हुई ब्रम्हांड की स्मृति है।
यदि इन्द्रियों द्वारा सीमित होने के बावजूद तुम अपने जन्म और मृत्यु के बीच की कुछ विशेष बातों को याद रख सकते हो तो समय, जो तुम्हारे जन्म से पहले भी था और तुम्हारी मृत्यु के बाद भी सदा रहेगा, कितनी अधिक बातों को याद रख सकता है?
मैं तुमसे कहता हूँ, समय हर छोटी से छोटी बात को याद रखता है--केवल उन बातों को ही नहीं जो तुम्हे स्पष्ट याद हैं, बल्कि उन बातों को भी जिनसे तुम पूरी तरह अनजान हो।
क्योंकि समय कुछ भी नहीं भूलता; छोटी से छोटी चेष्टा, श्वास-निःश्वास, या मन की तरंग तक को नहीं। और वह सब कुछ जो समय की स्मृति में अंकित होता है स्थान में मौजूद पदार्थ पर गहरा खोद दिया जाता है।
वही धरती जिस पर तुम चलते हो, वही हवा जिसमे तुम श्वास लेते हो, वाही मकान जिसमे तुम रहते हो, तुम्हारे अतीत, वर्तमान तथा भावी जीवन की सूक्ष्मतम बातों को सहज ही तुम्हारे सामने प्रकट कर सकते हैं, यदि तुममे केवल पढ़ने की शक्ति और अर्थ को ग्रहण करने की उत्सुकता हो।
जैसे जीवन में वैसे ही मृत्यु में, जैसे धरती पर वैसे ही धरती से परे, तुम कभी अकेले नहीं हो, बल्कि उन पथार्थों और जीवों की निरंतर संगति में ही जो तुम्हारे जीवन और मृत्यु में भागीदार हो। जैसे तुम उनसे कुछ लेते हो, वैसे ही वे तुमसे कुछ लेते हैं, औए जैसे तुम उन्हें ढूंढ़ते हो, वैसे हो वे तुम्हे ढूंढ़ते हैं।
हर पदार्थ में मनुष्य की इच्छा शामिल है और मनुष्य में शामिल है पदार्थ की इच्छा। यह परस्पर विनिमय निरंतर चलता है। परन्तु मनुष्य की दुर्बल स्मृति एक बहुत ही घटिया मुनीम है। समय की अचूक स्मृति का यह हाल नहीं है; वह मनुष्य के अपने साथी मनुष्य के साथ तथा ब्रम्हांड के एनी सब जीवों के साथ संबंधों का पूरा-पूरा हिसाब रखती है, और मनुष्य को हर जीवन हर मृत्यु में प्रतिक्षण अपना हिसाब चुकाने पर विवश करती है।
बिजली कभी किसी मकान पर नहीं गिरती जब तक वह मकान उसे अपनी ओर न खींचे। अपनी बर्बादी के लिये यह मकान उतना ही जिम्मेदार होता है, जितनी बिजली।
साँड कभी किसी को सीग नहीं मारता जब तक वह मनुष्य उसे सींग मारने का निमंत्रण न दे और वास्तव में वह मनुष्य इस रक्त-पात के लिये साँड से अधिक उत्तरदायी होता है।
मारा जाने वाला मारनेवाले के छुरे को सान देता है और घातक बार दोनों करते हैं। लुटनेवाला लूटनेवाले की चेष्टाओं को निर्देश देता है और डाका दोनों डालते हैं।
हाँ, मनुष्य अपनी विपत्तियों को निमंत्रण देता है और फिर इन दुखदायी अतिथियों के प्रति विरोध प्रकट करता है, क्योंकि वह भूल जाता है कि उसने कैसे, कब और कहाँ उन्हें निमंत्रण-पत्र लिखे और भेजे थे। परन्तु समय नहीं भूलता; समय उचित अवसर पर हर निमंत्रण-पत्र ठीक पते पर दे देता है। और समय ही हर अतिथि को मेजबान के घर पहुंचाता है।
मैं तुमसे कहता हूँ, किसी अथिति का विरोध मत करो, कहीं ऐसा न हो बहुत ज्यादा ठहरकर, या जितनी बार वह अन्यथा आवश्यक समझता उससे अधिक बार आकर, वह अपने स्वाभिमान को लगी ठेस का बदला ले।
अपने सभी अतिथियों का प्रेमपूर्वक सत्कार करो, उनकी चाल-ढाल और उनका व्यवहार कैसा भी हो, क्योंकि वे वास्तव में केवल तुम्हारे लेनदार हैं। खासकर अप्रिय अतिथियों का जितना चाहिए उससे भी अधिक सत्कार करो ताकि वे संतुष्ट और आभारी होकर जाएँ, और दुबारा तुम्हारे घर आयें तो मित्र बनकर आयें, लेनदार नहीं।
प्रत्येक अतिथि की ऐसी आवभगत करो मानो वह तुम्हारा विशेष सम्मानित अतिथि हो, ताकि तुम उसका विश्वास प्राप्त कर सको और उसके आने के गुप्त उद्देश्यों को जान सको।
दुर्भाग्य को इस प्रकार स्वीकार करो मानो वह सौभाग्य हो, क्योंकि दुर्भाग्य को यदि एक बार समझ लिया जाये तो वह शीघ्र ही सौभाग्य में बदल जाता है। जबकि सौभाग्य का यदि गलत अर्थ लगा लिया जाये तो वह शीघ्र ही दुर्भाग्य बन जाता है।
तुम्हारी अस्थिर स्मृति स्पष्ट दिखाई दे रहे छिद्रों और दरारों से भरा भ्रमों का जाल है; इसके बावजूद अपने जन्म तथा मृत्यु का, उसके समय,स्थान और ढंग का चुनाव भी तुम स्वयं ही करते हो।
बुद्धिमत्ता का दावा करने वाले घोषणा करते हैं कि अपने जन्म और मृत्यु में मनुष्य का कोई हाथ नहीं होता। आलसी लोग, जो समय और स्थान को अपनी संकीर्ण तथा टेढ़ी नजर से देखते हैं, समय और स्थान में घटनेवाली अधिकाँश घटनाओं को संयोग मानकर उन्हें सहज ही मन से निकाल देते हैं। उनके मिथ्या गर्व और धोखे से सावधान, मेरे साथियो।
समय और स्थान के अंदर कोई आकस्मिक घटना नहीं होती। सब घटनाएं प्रभु-इच्छा के आदेश से घटती हैं, जो जो न किसी बात में गलती करती हैं, न किसी चीज को अनदेखा करती हैं।
जैसे बर्षा की बूँदें अपने आप को झरनों में एकत्र कर लेती हैं, झरने, नालों और छोटी नदियों में इकट्ठेहोने के लिये बहते हैं, छोटी नदियाँ तथा नाले अपने आपको सहायक नदियों के रूप में बड़ी नदियों को अर्पित कर देते हैं, महानदियाँ अपने जल को सागर तक पहुंचा देती हैं, और सागर महासागर में इकट्ठे हो जाते हैं, वैसे ही हर सृष्ट पदार्थ या जीव की हर इच्छा एक सहायक नदी के रूप में बहकर प्रभु-इच्छा में जा मिलती है।
मैं तुमसे कहता हूँ कि हर पदार्थ की इच्छा होती है। यहाँ तक कि पत्थर भी, जो देखने मैं इतना गूँगा, बहरा और बेजान होता है, इच्छा से विहीन नहीं होता। इसके बिना इसका अस्तित्व ही नहीं होता, और न वह किसी चीज को प्रभावित करता न कोई चीज उसे प्रभावित करती। इच्छा करने का और अस्तित्व का उसका बोध मात्रा में महुष्य के बोध से भिन्न हो सकता है, परन्तु अपने मूल रूप में नहीं। एक दिन के जीवन के कितने अंश के बोध का तुम दावा कर सकते हो? निःसंदेह, एक बहुत ही थोड़े अंश का।
बुद्धि और स्मरण-शक्ति से तथा भावनाओं और विचारों को दर्ज करने के साधनों से सम्पन्न होते हुए भी यदि तुम दिन के जीवन के अधिकाँश भाग से बेखबर रहते हो, तो फिर पत्थर अपने जीवन और इच्छा से इस तरह बेखबर रहता है तो तुम्हे आश्चर्य क्यों होता है?
और जिस प्रकार जीने और चलने-फिरने का बोध न होते हुए तुम इतना जी लेते हो, चल-फिर लेते हो, उसी प्रकार इच्छा करने का बोध न होते हुए भी तुम इतनी इच्छाएँ कर लेते हो। किन्तु प्रभु-इच्छा को तुम्हारे और ब्रम्हांड के हर जीव और पदार्थ की निर्बोधता का ज्ञान है।
समय के प्रत्येक क्षण और और स्थान के प्रत्येक बिंदु पर अपने आपको फिरसे बाँटना प्रभु-- इच्छा का स्वभाव है। और ऐसा करते हुए प्रभु-- इच्छा हर मनुष्य को और हर पदार्थ को वह सब लौटा देती है---न उससे अधिक न कम--जिसकी उसने जानते हुए और अनजाने में इच्छा की थी। परन्तु मनुष्य यह बात नहीं जानते, इसलिए प्रभु- इच्छा के थैले में से, जिसमे सबकुछ होता है, उनके हिस्से में जो भी आता है उससे वह बहुधा निराश हो जाते हैं। और फिर हताश होकर शिकायत करते हैं और अपनी निराशा के लिये चंचल भाग्य को दोषी ठहराते हैं।
भाग्य चंचल नहीं होता, साधुओ, क्योंकि भाग्य प्रभु-इच्छा का ही दुसरा नाम है। यह तो मनुष्य की इच्छा है जो अभी तक अत्यंत चपल, अत्यंत अनियमित तथा अपने मार्ग के बारे में अनिश्चित है। यह आज तेजी से पूर्व की ओर दौड़ती है तो कल पश्चिम की ओर। यह किसी चीज पर यहाँ अच्छाई की मोहर लगा देती है, तो उसी को वहां बुरा कहकर उसकी निंदा करती है। अभी यह किसी को मित्र के रूप में स्वीकार करती है, अगले ही पल उसी को शत्रु मानकर उससे युद्ध छेड़ देती है।
तुम्हारी इच्छा को चंचल नहीं होना चाहिये, मेरे साथियो। यह जान लो कि पदार्थ और मनुष्य के साथ तुम्हारे सम्बन्ध इस बात से तय होते हैं कि तुम उससे क्या चाहते हो और वे तुमसे क्या चाहते हैं। और जो तुम उनसे चाहते हो, उसी से यह निर्धारित होता है कि वे तुम से क्या चाहते हैं।
इसलिये मैंने पहले भी तुमसे कहा था, और अब भी कहता हूँ: ध्यान रखो तुम कैसे साँस लेते हो, कैसे बोलते हो, क्या चाहते हो, क्या सोचते,कहते और करते हो। क्योंकि तुम्हारी इच्छा हर सांस में,हर चाह में, तुम्हारे हर विचार, वचन और कर्म में छिपी रहती है। और जो तुमसे छिपा है वह प्रभु-इच्छा के लिये सदा प्रकट है।
किसी मनुष्य से ऐसे सुख की इच्छा न रखो जो उसके लिये दुःख हो; कहीं ऐसा न हो कि तुम्हारा सुख तुम्हे उस दुःख से अधिक पीड़ा दे।
न ही किसी से ऐसे हित की कामना करो जो उसके लिये अहित हो;कहीं ऐसा न हो कि तुम अपने ही लिये अहित की कामना कर रहे होओं।
बल्कि सब मनुष्यों और सब पदार्थों से उनके प्रेम की इच्छा करो;क्योंकि उसी के द्वारा तुम्हारे परदे उठेंगे, तुम्हारे ह्रदय में ज्ञान प्रकट होगा जो तुम्हारी इच्छा को प्रभु-इच्छा के अद्भुत रहस्यों से परिचित करा देगा।
जब तक तुम्हे सब पदार्थों का बोध नहीं हो जाता, तब तक तुम्हे न अपने अंदर उनकी इच्छा का बोध हो सकता है और न उनके अंदर अपनी इच्छा का।
जब तक तुम्हे सभी पदार्थों में अपनी इच्छा तथा अपने अंदर उनकी इच्छा का बोध नहीं हो जाता, तब तक तुम प्रभु-इच्छा के रहस्यों को नहीं जान सकते।
और जब तक प्रभु-इच्छा के रहस्यों को जान न लो, तुम्हे अपनी इच्छा को उसके विरोध में खडा नहीं करना चाहिये; क्योंकि पराजय निःसंदेह तुम्हारी होगी। हर टकराव में तुम्हारा शारीर घायल होगा और तुम्हारा ह्रदय कटुता से भर जायेगा। तब तुम बदला लेने का प्रयास करोगे, और परिणाम यह होगा तुम्हारे घावों में नये घाव जुड़ जायेंगे और तुम्हारी कटुता का प्याला भरकर छलकने लगेगा।
मैं तुमसे कहता हूँ, यदि तुम हार को जीत में बदलना चाहते हो तो प्रभु-इच्छा को स्वीकार करो। बिना किसी आपत्ति के स्वीकार करो उन सब पदार्थों को जो उसके रहस्यपूर्ण थैले में से तुम्हारे लिये निकलें; कृतज्ञता तथा इस विश्वास के साथ स्वीकार करो कि प्रभु इच्छा में वे तुम्हारा उचित तथा नियत हिस्सा हैं। उनका मूल्य और अर्थ समझने की दृढ़ भावना से उन्हें स्वीकार करो।
और जब एक बार तुम अपनी इच्छा की गुप्त कार्य-प्रणाली को समझ लोगे,तो तुम प्रभु इच्छा को समझ लोगे।
जिस बात को तुम नहीं जानते उसे स्वीकार करो ताकि उसे जानने में वह तुम्हारी सहायता करे। उसके प्रति रोष प्रकट करोगे तो वह एक अनबूझ पहेली बनी रहेगी।
अपनी इच्छा को तब तक प्रभु- इच्छा की दासी बनी रहने दो जब तक दिव्य ज्ञान प्रभु-इच्छा को तुम्हारी इच्छा की दासी न बना दे।
यही शिक्षा थी मेरी नूह को।
यही शिक्षा है मेरी तुम्हे।